ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ के दिव्य वचन
५७) काम क्रोध बुरे हैं किन्तु ईश्वर नें कारण से इनको रचा है। जब तक ये सीमा में रहें, किसी का अनर्थ ना करें तो कोई बुराई नहीं। तू इनको जड़ से मिटाने की चेष्ठ ना कर। काम सृष्टि हित व वर्धन हेतु है जबकि क्रोद्ध आत्मरक्षा के लिए। इनका सही समय पर, उचित प्रयोग करने वाला ही योगी व धीर भक्त पुरुष है। अनियंत्रित ही पापी और पाप संभवा हैं।
ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ के दिव्य वचन ५७) काम क्रोध बुरे हैं किन्तु ईश्वर नें कारण से इनको रचा है। जब तक ये सीमा में रहें, किसी का अनर्थ ना करें तो कोई बुराई नहीं। तू इनको जड़ से मिटाने की चेष्ठ ना कर। काम सृष्टि हित व वर्धन हेतु है जबकि क्रोद्ध आत्मरक्षा के लिए। इनका सही समय पर, उचित प्रयोग करने वाला ही योगी व धीर भक्त पुरुष है। अनियंत्रित ही पापी और पाप संभवा हैं।
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