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  • नवम नवरात्र वर देंगी महाशक्ति सिद्धिदात्री

    मार्कंडेय पुराण के अनुसार नवम नवरात्र की देवी का नाम सिद्धिदात्री है, एक बार कैलाशाधिपति भगवान शिव से देवी पार्वती नें पूछा की भगवन आप इतने विराट और अंतहीन कैसे हैं और सभी सिद्धियाँ आप में कैसे निहित हैं, तो शिव देवी स बोले देवी आप ही वो शक्ति हैं जो मेरी समस्त शक्तियों का मूल हैं किन्तु पर्वतराज के घर उत्पन्न होने से आप पूर्व भूल गयी हैं, अत: आप ज्ञान प्राप्त करें, तब देवी नें शिव से पहले ज्ञान प्राप्त किया जो आगम निगम बने, फिर आगमों निगमों से परिपूर्ण हो देवी को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ, तब देवी सभी सिद्धियों को धारण किये परात्पर मंडल में विराजमान हुई,माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं, इनका वाहन सिंह है, ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं, इनके नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है, माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाता है, देवी की आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता , दूर श्रवण , परकाया प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है, यदि कोई अत्यंत कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर भी माँ की कृपा का पात्र बन सकता है, ऐसी देवी की महिमा तो शास्त्र भी नहीं बता सकते, बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी देवी की अपार क्षमताओं के आगे नतमस्तक हैं, देवी को पूर्णावतार भी माना गया है, इनकी साधना से ही सभी प्रकार की सिद्धियाँ व शक्तियां साधक प्राप्त करता है, देवी महा महिमा के करण इनको सिद्धिदात्री पुकारा गया है

    परात्पर मंडल में स्थित सर्व सिद्धियों वाली महादेवी ही सिद्धिदात्री देवी हैं, महाशक्ति सिद्धिदात्री स्वयं योगमाया ही हैं जो सारी शक्तियों व सिद्धियों की मूल है, यह भी कथा आती है की शिव द्वारा देवी को को ज्ञान देने से जब देव पूर्ण हुई तब सिद्धिदात्री स्वरुप में प्रकट हुई, देवी के उपासक देवी से आशीष ले कर सभी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं, देवी सिद्धिदात्री की भक्ति करने वाले भक्त की त्रिलोकी भर में जय-जयकार होती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए नवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के तेहरवें अध्याय का पाठ करना चाहिए
    पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें

    महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
    (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)
    देवी सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए नौवें दिन का प्रमुख मंत्र है
    मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्री देव्यै नम:

    दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

    जैसे मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्री देव्यै स्वाहा:
    माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा मोतियों की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
    यन्त्र-

    990 022 500 707 210 880
    009 321 690

    यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल या पीले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, सिद्धिदात्री देवी का श्रृंगार लाल व पीले वस्त्रों व आभूषणों से ही किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा प्रभात व संध्या अथवा रात्री को की जा सकती है, संध्या व रात्री की पूजा का समय देवी सिद्धिदात्री की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी संध्या या रात्री के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए
    मन्त्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॥

    मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को रुद्राक्ष या सोने चाँदी से बने आभूषण माला आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में पूजा का सामान नारियल वस्त्र चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र के गुरुमंडल में देवी का ध्यान करने से साधक महासमाधी प्राप्त करता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में केसर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

    चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै
    ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, आठवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी,देवी से अणिमादी सिद्धियों की प्राप्ति होती है या कोई गुप्त इच्छा हो तो पूर्ण होती है, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

    ॐ जां जातिस्वरूपिन्ये निशुम्भबधकारिनयै नम:
    (न आधा लगेगा)
    नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

    ॐ या श्री: स्वयं सुकृतानाम भवनेश्वलक्ष्मी:
    पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:,
    श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
    तां त्वां नता: स्म परिपालय देवी विश्वं

    यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा नौवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी भी निकट के क्षेत्रीय शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज नौवें नवरात्र को नौ कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, नौवें नवरात्र को अपने गुरु से "पूर्णत्व दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूर्णता और तृप्ति को अनुभव कर सकें व आनन्दमय शरीर की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, नौवें नवरात्र पर होने वाले हवन में खीर व पंचमेवा की आहुतियाँ देनी चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले नौवें नवरात्र का ब्रत साय ठीक सात बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों व मिठाइयों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल व पीले रंग के वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए
    कौलान्तक पीठाधीश्वर
    महायोगी सत्येन्द्र नाथ
    #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani
    नवम नवरात्र वर देंगी महाशक्ति सिद्धिदात्री मार्कंडेय पुराण के अनुसार नवम नवरात्र की देवी का नाम सिद्धिदात्री है, एक बार कैलाशाधिपति भगवान शिव से देवी पार्वती नें पूछा की भगवन आप इतने विराट और अंतहीन कैसे हैं और सभी सिद्धियाँ आप में कैसे निहित हैं, तो शिव देवी स बोले देवी आप ही वो शक्ति हैं जो मेरी समस्त शक्तियों का मूल हैं किन्तु पर्वतराज के घर उत्पन्न होने से आप पूर्व भूल गयी हैं, अत: आप ज्ञान प्राप्त करें, तब देवी नें शिव से पहले ज्ञान प्राप्त किया जो आगम निगम बने, फिर आगमों निगमों से परिपूर्ण हो देवी को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ, तब देवी सभी सिद्धियों को धारण किये परात्पर मंडल में विराजमान हुई,माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं, इनका वाहन सिंह है, ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं, इनके नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है, माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाता है, देवी की आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता , दूर श्रवण , परकाया प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है, यदि कोई अत्यंत कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर भी माँ की कृपा का पात्र बन सकता है, ऐसी देवी की महिमा तो शास्त्र भी नहीं बता सकते, बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी देवी की अपार क्षमताओं के आगे नतमस्तक हैं, देवी को पूर्णावतार भी माना गया है, इनकी साधना से ही सभी प्रकार की सिद्धियाँ व शक्तियां साधक प्राप्त करता है, देवी महा महिमा के करण इनको सिद्धिदात्री पुकारा गया है परात्पर मंडल में स्थित सर्व सिद्धियों वाली महादेवी ही सिद्धिदात्री देवी हैं, महाशक्ति सिद्धिदात्री स्वयं योगमाया ही हैं जो सारी शक्तियों व सिद्धियों की मूल है, यह भी कथा आती है की शिव द्वारा देवी को को ज्ञान देने से जब देव पूर्ण हुई तब सिद्धिदात्री स्वरुप में प्रकट हुई, देवी के उपासक देवी से आशीष ले कर सभी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं, देवी सिद्धिदात्री की भक्ति करने वाले भक्त की त्रिलोकी भर में जय-जयकार होती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए नवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के तेहरवें अध्याय का पाठ करना चाहिए पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं) देवी सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के लिए नौवें दिन का प्रमुख मंत्र है मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्री देव्यै नम: दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें जैसे मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्री देव्यै स्वाहा: माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा मोतियों की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ यन्त्र- 990 022 500 707 210 880 009 321 690 यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को लाल या पीले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, सिद्धिदात्री देवी का श्रृंगार लाल व पीले वस्त्रों व आभूषणों से ही किया जाता है, लाल व पीले रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा प्रभात व संध्या अथवा रात्री को की जा सकती है, संध्या व रात्री की पूजा का समय देवी सिद्धिदात्री की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी संध्या या रात्री के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए मन्त्र - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॥ मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को रुद्राक्ष या सोने चाँदी से बने आभूषण माला आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में पूजा का सामान नारियल वस्त्र चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र के गुरुमंडल में देवी का ध्यान करने से साधक महासमाधी प्राप्त करता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में केसर व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, आठवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी,देवी से अणिमादी सिद्धियों की प्राप्ति होती है या कोई गुप्त इच्छा हो तो पूर्ण होती है, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र ॐ जां जातिस्वरूपिन्ये निशुम्भबधकारिनयै नम: (न आधा लगेगा) नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें ॐ या श्री: स्वयं सुकृतानाम भवनेश्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:, श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवी विश्वं यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा नौवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी भी निकट के क्षेत्रीय शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज नौवें नवरात्र को नौ कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, नौवें नवरात्र को अपने गुरु से "पूर्णत्व दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूर्णता और तृप्ति को अनुभव कर सकें व आनन्दमय शरीर की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, नौवें नवरात्र पर होने वाले हवन में खीर व पंचमेवा की आहुतियाँ देनी चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले नौवें नवरात्र का ब्रत साय ठीक सात बजे खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों व मिठाइयों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल व पीले रंग के वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani
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  • https://kaulantakvani.blogspot.com/2019/04/mahagauri-mantra.html?m=1
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  • मार्कंडेय पुराण के अनुसार अष्टम नवरात्र की देवी का नाम महागौरी है, एक बार कैलाशाधिपति भगवान शिव से विवाह करने के लिए देवी पार्वती ने अत्यंत कठोर तप किया, कई सहस्त्र वर्षों तक दिन रात तपस्या करने से देवी अत्यंत कम्जूर क्षीण काय हो गयीं, देवी पार्वती की त्वचा का रंग बहुत काला पड़ गया, चमड़ी जगह-जगह से फट गयी, तब भगवान शिव ने उनको गंगा जल से दिव्य देह प्रदान की, तब देवी अत्यंत गौर वर्ण की अत्यंत सुन्दर बालिका बन गयीं, शास्त्रों में निहित महिमा के अनुसार देवी महागौरी की आयु केवल आठ वर्ष ही है, देवी बृषभ बहन पर बैठी हुई हैं, चतुर्भुज रूप में बर अभय मुद्रा के साथ ही एक हाथ में त्रिशूल धारण किये दूसरे में डमरू धरे हुये देवी अत्यंत श्वेत वस्त्रों व आभूषणों से प्रकाशित हो रही हैं, देवी महागौरी की उपासना करने वाला साधक कभी बृद्ध नहीं होता, साधना व अध्यातम धर्म के पथ पर चलने वाले तपस्वी साधकों को अवश्य देवी महागौरी की उपासना करनी चाहिए, देवी की पूजा से अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, सकल मनोकामना पूरी करने वाली देवी बहुत ही शांत एवं शीघ्र प्रसन्न हो कर अपने भक्त को वर देती हैं,देवी पूजा कर शिव की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है, देवी महागौरी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं नौ देवियों के महानवरात्र
    शिव ने महातपस्विनी पार्वती को गंगाजल से जो दिव्य रूप प्रदान किया वही देवी महागौरी हैं, महाशक्ति महागौरी स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि की मूल शक्ति व जननी है, यह भी कथा आती है की शिव द्वारा देवी को काली पुकारे जाने पर देवी ने गौर वर्ण धारण कर शिव को प्रसन्न किया था अत: देवी को महागौरी कहा गया है, देवी के उपासक भी देवी सामान ही अत्यंत सुदर देह प्राप्त करते हैं व कभी बूढ़े नहीं होते, देवी महागौरी की भक्ति करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देवी अद्भुत कृपा व प्रेम बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए आठवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के ग्यारवें व बारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,

    महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
    (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

    देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन का प्रमुख मंत्र है

    मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल महागौरी देव्यै नम:

    दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें

    जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल महागौरी देव्यै स्वाहा:



    माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ
    यन्त्र-
    587 923 398
    597 335 132
    577 834 989

    यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को सफेद रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, गौरी देवी का श्रृंगार सफेद वस्त्रों व आभूषणों से ही किया जाता है, सफेद रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा प्रभात को ही की जा सकती है, सुबह की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी सुबह के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व इत्र सुगंधी अर्पित कर गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए व अष्टम नवरात्र को ध्वजा पर फूल माला अर्पित करनी चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

    मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल

    मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को सफेद चन्दन से बने आभूषण माला तिलक आदि अर्पित करना चाहिए
    मंदिर में फल व सफेद वस्त्र चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र के ब्रह्मरंध्र में देवी का ध्यान करने से साधक पूर्णप्रग्य होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में तुलसी का रस व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए

    चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

    ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, आठवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा तीर्थ का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी,देवी से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है सभी तरह की समस्याओं का अंत होता है या कोई गुप्त इच्छा हो तो पूर्ण होती है, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

    ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिन्ये रक्बीजबधकारिनयै नम:
    (न आधा लगेगा)

    नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें

    ॐ त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
    विश्वस्य बीजं परमासि माया
    सम्मोहितं देवी समस्तमेतत
    त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु:

    यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा आठवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी पर्वतीय शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज आठवें नवरात्र को आठ कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ वस्त्र आभूषण आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, आठवें नवरात्र को अपने गुरु से "कालातीत दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन कीउच्चता और नित्यता को अनुभव कर सकें व विज्ञानमय शरीर की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, आठवें नवरात्र पर होने वाले हवन में मुनक्का व सफेद तिल की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले आठवें नवरात्र का ब्रत साय ठीक सात सत्तावन पर खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को हल्के रंग के वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और हल्के रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

    -कौलान्तक पीठाधीश्वर
    महायोगी सत्येन्द्र नाथ
    #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani #Navratri
    मार्कंडेय पुराण के अनुसार अष्टम नवरात्र की देवी का नाम महागौरी है, एक बार कैलाशाधिपति भगवान शिव से विवाह करने के लिए देवी पार्वती ने अत्यंत कठोर तप किया, कई सहस्त्र वर्षों तक दिन रात तपस्या करने से देवी अत्यंत कम्जूर क्षीण काय हो गयीं, देवी पार्वती की त्वचा का रंग बहुत काला पड़ गया, चमड़ी जगह-जगह से फट गयी, तब भगवान शिव ने उनको गंगा जल से दिव्य देह प्रदान की, तब देवी अत्यंत गौर वर्ण की अत्यंत सुन्दर बालिका बन गयीं, शास्त्रों में निहित महिमा के अनुसार देवी महागौरी की आयु केवल आठ वर्ष ही है, देवी बृषभ बहन पर बैठी हुई हैं, चतुर्भुज रूप में बर अभय मुद्रा के साथ ही एक हाथ में त्रिशूल धारण किये दूसरे में डमरू धरे हुये देवी अत्यंत श्वेत वस्त्रों व आभूषणों से प्रकाशित हो रही हैं, देवी महागौरी की उपासना करने वाला साधक कभी बृद्ध नहीं होता, साधना व अध्यातम धर्म के पथ पर चलने वाले तपस्वी साधकों को अवश्य देवी महागौरी की उपासना करनी चाहिए, देवी की पूजा से अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, सकल मनोकामना पूरी करने वाली देवी बहुत ही शांत एवं शीघ्र प्रसन्न हो कर अपने भक्त को वर देती हैं,देवी पूजा कर शिव की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है, देवी महागौरी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं नौ देवियों के महानवरात्र शिव ने महातपस्विनी पार्वती को गंगाजल से जो दिव्य रूप प्रदान किया वही देवी महागौरी हैं, महाशक्ति महागौरी स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि की मूल शक्ति व जननी है, यह भी कथा आती है की शिव द्वारा देवी को काली पुकारे जाने पर देवी ने गौर वर्ण धारण कर शिव को प्रसन्न किया था अत: देवी को महागौरी कहा गया है, देवी के उपासक भी देवी सामान ही अत्यंत सुदर देह प्राप्त करते हैं व कभी बूढ़े नहीं होते, देवी महागौरी की भक्ति करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देवी अद्भुत कृपा व प्रेम बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए आठवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के ग्यारवें व बारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए, पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें, महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं) देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन का प्रमुख मंत्र है मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल महागौरी देव्यै नम: दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल महागौरी देव्यै स्वाहा: माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ यन्त्र- 587 923 398 597 335 132 577 834 989 यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को सफेद रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, गौरी देवी का श्रृंगार सफेद वस्त्रों व आभूषणों से ही किया जाता है, सफेद रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा प्रभात को ही की जा सकती है, सुबह की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी सुबह के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व इत्र सुगंधी अर्पित कर गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए व अष्टम नवरात्र को ध्वजा पर फूल माला अर्पित करनी चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं प्रज्वल-प्रज्वल मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को सफेद चन्दन से बने आभूषण माला तिलक आदि अर्पित करना चाहिए मंदिर में फल व सफेद वस्त्र चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र के ब्रह्मरंध्र में देवी का ध्यान करने से साधक पूर्णप्रग्य होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में तुलसी का रस व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, आठवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा तीर्थ का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी,देवी से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है सभी तरह की समस्याओं का अंत होता है या कोई गुप्त इच्छा हो तो पूर्ण होती है, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं, देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिन्ये रक्बीजबधकारिनयै नम: (न आधा लगेगा) नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें, व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें ॐ त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया सम्मोहितं देवी समस्तमेतत त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु: यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा आठवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी पर्वतीय शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज आठवें नवरात्र को आठ कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्याओं को दक्षिणा के साथ वस्त्र आभूषण आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, आठवें नवरात्र को अपने गुरु से "कालातीत दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन कीउच्चता और नित्यता को अनुभव कर सकें व विज्ञानमय शरीर की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, आठवें नवरात्र पर होने वाले हवन में मुनक्का व सफेद तिल की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले आठवें नवरात्र का ब्रत साय ठीक सात सत्तावन पर खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को हल्के रंग के वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और हल्के रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए -कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani #Navratri
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  • मार्कंडेय पुराण के अनुसार सप्तम नवरात्र की देवी का नाम कालरात्रि है, शिव ने सृष्टि को बनाया शिव ही इसे नष्ट करेंगे, शिव की इस महालीला में जो सबसे गुप्त पहलू है वो है कालरात्रि, प्राचीन कथा के अनुसार एक बार शिव नें ये जानना चाहा कि वे कितने शक्तिशाली हैं, सबसे पहले उनहोंने सात्विक शक्ति को पुकारा तो योगमाया हाथ जोड़ सम्मुख आ गयी और उनहोंने शिव को सारी शक्तियों के बारे में बताया, फिर शिव ने राजसी शक्ति को पुकारा तो माँ पार्वती देवी दुर्गा व दस महाविद्याओं के साथ उपस्थित हो गयीं, देवी ने शिव को सबकुछ बताया जो जानना चाहते थे, तब शिव ने तामसी और सृष्टि कि आखिरी शक्ति को बुलाया तो कालरात्रि प्रकट हुई, काल रात्रि से जब शिव ने प्रश्न किया तो कालरात्रि ने अपनी शक्ति से दिखाया कि वो ही सृष्टि कि सबसे बड़ी शक्ति हैं गुप्त रूप से वही योगमाया, दुर्गा पार्वती है, एक क्षण में देवी ने कई सृष्टियों को निगल लिया, कई नीच राक्षस पल बर में मिट गए, देवी के क्रोध से नक्षत्र मंडल विचलित हो गया, सूर्य का तेज मलीन हो गया, तीनो लोक भस्म होने लगे, तब शिव नें देवी को शांत होने के लिए कहा लेकिन देवी शांत नहीं हुई, उनके शरीर से 64 कृत्याएं पैदा हुई, स्वर्ग सहित, विष्णु लोक, ब्रम्ह्म लोक, शिवलोक व पृथ्वी मंडल कांपने लगे, 64 कृत्याओं ने महाविनाश शुरू कर दिया, सर्वत्र आकाश से बिजलियाँ गिरने लगी तब समस्त ऋषि मुनि ब्रह्मा-विष्णु देवगण कैलाश जा पहुंचे शिव के नेत्रित्व में सबने देवी की स्तुति करते हुये शांत होने की प्रार्थना, तब देवी ने कृत्याओं को भीतर ही समां लिया, सभी को उपस्थित देख देवी ने अभय प्रदान किया, सबसे शक्तिशालिनी देवी ही कालरात्रि हैं जो महाकाली का ही स्वरुप हैं, जो भी साधक भक्त देवी की पूजा करता है पूरी सृष्टि में उसे अभय होता है, देवी भक्त पर कोई अस्त्र शास्त्र मंत्र तंत्र कृत्या औषधि विष कार्य नहीं करता, देवी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं

    शिव ने सबसे बड़ी शक्ति को को जानने के लिए जिस देवी को उत्पन्न किया वही कालरात्रि हैं, महाशक्ति कालरात्रि स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि का आदि थी अब अंत है, उतपन्न करने तथा महाविनाश की शक्ति होने से प्रलय काल की भाँती देवी को कालरात्रि कहा गया है, देवी के उपासक के जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता, देवी कि स्तुति करने वाले भक्त पर देवी शीघ्र प्रसन्न हो कृपा बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए सातवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करना चाहिए
    पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें,

    महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे
    (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं)

    देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन का प्रमुख मंत्र है,

    मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै नम:

    दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें,

    जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै स्वाहा:

    माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा हकीक की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ

    यन्त्र-
    090 010 070
    080 030 020
    040 050 060

    यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को काले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, कालरात्रि देवी का श्रृंगार काले वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा रात्री को ही की जा सकती है, संध्या की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी शाम के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक व चौमुखा दिया जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए

    मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल

    मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को नारियल व उर्द की ड़ाल काली मिर्च आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में मीठी रोटी का भोग चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र में देवी का ध्यान करने से सातवां चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में अदरक का रस , लौंग व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए,

    चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै

    ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, सातवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे शत्रुओं कि समस्या हो या बार बार धन हानि होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं , देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र

    ॐ तृम तृषास्वरूपिन्ये चंडमुण्डबधकारिनयै नम:(न आधा लगेगा)
    नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें
    व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें
    ॐ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोकस्याखिलेश्वरी
    एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरीविनाशनम

    यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा सातवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी कालिका शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज सातवें नवरात्र को सात कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ भोजन पात्र जैसे थाली गिलास आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, सातवें नवरात्र को अपने गुरु से "सह्स्त्रहार भेदन दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूरनता को अनुभव कर सकें व वैखरी वाणी की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, सातवें नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा व काली मिर्च की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले सातवें नवरात्र का ब्रत ठीक आठ बाबन पर खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर व फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल पीले व चमकीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और लाल पीले व चमकीले वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए

    -कौलान्तक पीठाधीश्वर
    महायोगी सत्येन्द्र नाथ
    #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani #Navratri #Parv
    मार्कंडेय पुराण के अनुसार सप्तम नवरात्र की देवी का नाम कालरात्रि है, शिव ने सृष्टि को बनाया शिव ही इसे नष्ट करेंगे, शिव की इस महालीला में जो सबसे गुप्त पहलू है वो है कालरात्रि, प्राचीन कथा के अनुसार एक बार शिव नें ये जानना चाहा कि वे कितने शक्तिशाली हैं, सबसे पहले उनहोंने सात्विक शक्ति को पुकारा तो योगमाया हाथ जोड़ सम्मुख आ गयी और उनहोंने शिव को सारी शक्तियों के बारे में बताया, फिर शिव ने राजसी शक्ति को पुकारा तो माँ पार्वती देवी दुर्गा व दस महाविद्याओं के साथ उपस्थित हो गयीं, देवी ने शिव को सबकुछ बताया जो जानना चाहते थे, तब शिव ने तामसी और सृष्टि कि आखिरी शक्ति को बुलाया तो कालरात्रि प्रकट हुई, काल रात्रि से जब शिव ने प्रश्न किया तो कालरात्रि ने अपनी शक्ति से दिखाया कि वो ही सृष्टि कि सबसे बड़ी शक्ति हैं गुप्त रूप से वही योगमाया, दुर्गा पार्वती है, एक क्षण में देवी ने कई सृष्टियों को निगल लिया, कई नीच राक्षस पल बर में मिट गए, देवी के क्रोध से नक्षत्र मंडल विचलित हो गया, सूर्य का तेज मलीन हो गया, तीनो लोक भस्म होने लगे, तब शिव नें देवी को शांत होने के लिए कहा लेकिन देवी शांत नहीं हुई, उनके शरीर से 64 कृत्याएं पैदा हुई, स्वर्ग सहित, विष्णु लोक, ब्रम्ह्म लोक, शिवलोक व पृथ्वी मंडल कांपने लगे, 64 कृत्याओं ने महाविनाश शुरू कर दिया, सर्वत्र आकाश से बिजलियाँ गिरने लगी तब समस्त ऋषि मुनि ब्रह्मा-विष्णु देवगण कैलाश जा पहुंचे शिव के नेत्रित्व में सबने देवी की स्तुति करते हुये शांत होने की प्रार्थना, तब देवी ने कृत्याओं को भीतर ही समां लिया, सभी को उपस्थित देख देवी ने अभय प्रदान किया, सबसे शक्तिशालिनी देवी ही कालरात्रि हैं जो महाकाली का ही स्वरुप हैं, जो भी साधक भक्त देवी की पूजा करता है पूरी सृष्टि में उसे अभय होता है, देवी भक्त पर कोई अस्त्र शास्त्र मंत्र तंत्र कृत्या औषधि विष कार्य नहीं करता, देवी की पूजा से सकल मनोरथ पूर्ण होते हैं शिव ने सबसे बड़ी शक्ति को को जानने के लिए जिस देवी को उत्पन्न किया वही कालरात्रि हैं, महाशक्ति कालरात्रि स्वयं योगमाया ही हैं जो सृष्टि का आदि थी अब अंत है, उतपन्न करने तथा महाविनाश की शक्ति होने से प्रलय काल की भाँती देवी को कालरात्रि कहा गया है, देवी के उपासक के जीवन में कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता, देवी कि स्तुति करने वाले भक्त पर देवी शीघ्र प्रसन्न हो कृपा बरसाती हैं, देवी को प्रसन्न करने के लिए सातवें नवरात्र के दिन दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का पाठ करना चाहिए पाठ करने से पहले कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें, फिर क्रमश: कवच का, अर्गला स्तोत्र का, फिर कीलक स्तोत्र का पाठ करें, आप यदि मनोकामना की पूर्ती के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं तो कीलक स्तोत्र के बाद रात्रिसूक्त का पाठ करना अनिवार्य होता है, यदि आप ब्रत कर रहे हैं तो लगातार देवी के नवारण महामंत्र का जाप करते रहें, महामंत्र-ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै बिच्चे (शब्द पर दो मात्राएँ लगेंगी काफी प्रयासों के बाबजूद भी नहीं आ रहीं) देवी कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए छठे दिन का प्रमुख मंत्र है, मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै नम: दैनिक रूप से यज्ञ करने वाले इसी मंत्र के पीछे स्वाहा: शब्द का प्रयोग करें, जैसे मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै स्वाहा: माता के मंत्र का जाप करने के लिए रुद्राक्ष अथवा हकीक की माला स्रेष्ठ होती है, माला न मिलने पर मानसिक मंत्र का जाप भी किया जा सकता है, यदि आप देवी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनका एक दिव्य यन्त्र कागज़ अथवा धातु या भोजपत्र पर बना लेँ यन्त्र- 090 010 070 080 030 020 040 050 060 यन्त्र के पूजन के लिए यन्त्र को काले रंग के वस्त्र पर ही स्थापित करें, पुष्प,धूप,दीप,ऋतू फल व दक्षिणा अर्पित करें, कालरात्रि देवी का श्रृंगार काले वस्त्रों से किया जाता है, लाल रंग के ही फूल चढ़ाना सरेष्ट माना गया है, माता को वस्त्र श्रृंगार व नारियल जरूर चढ़ाएं, माता की मंत्र सहित पूजा रात्री को ही की जा सकती है, संध्या की पूजा का समय देवी कूष्मांडा की साधना के लिए विशेष माना गया है, मंत्र जाप के लिए भी शाम के मुहूर्त के समय का ही प्रयोग करें, नवरात्रों की पूजा में देवी के लिए घी का अखंड दीपक व चौमुखा दिया जला लेना चाहिए, पूजा में स्थापित नारियल कलश का अक्षत से पूजन करना चाहिए व गंगाजल के छींटे देने चाहियें, पूजा स्थान पर स्थापित भगवे रंग की ध्वजा पर पुन: मौली सूत्र बांधें व अक्षत चढ़ाएं, ध्वजा को हमेशा कुछ ऊँचे स्थान पर रखना चाहिए, देवी के एक सौ आठ नामों का पाठ करें, यदि आप किसी ऐसी जगह हों जहाँ पूजा संभव न हो या आप बालक हो रोगी हों तो आपको पांचवें नवरात्र देवी के निम्न बीज मन्त्रों का जाप करना चाहिए मंत्र-ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल मंत्र को चलते फिरते काम करते हुये भी बिना माला मन ही मन जपा जा सकता है, देवी को प्रसन्न करने का गुप्त उपाय ये है कि देवी को नारियल व उर्द की ड़ाल काली मिर्च आदि अर्पित करना चाहिए, मंदिर में मीठी रोटी का भोग चढाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है व देवी की कृपा भी प्राप्त होती है, सह्स्त्रहार चक्र में देवी का ध्यान करने से सातवां चक्र जागृत होता है और ध्यान पूरवक मंत्र जाप से भीतर देवी के स्वरुप के दर्शन होते हैं, प्राश्चित व आत्म शोधन के लिए पानी में अदरक का रस , लौंग व शहद मिला कर दो माला चंडिका मंत्र पढ़ें व जल पी लेना चाहिए, चंडिका मंत्र-ॐ नमशचंडिकायै ऐसा करने से अनेक रोग एवं चिंताएं नष्ट होती हैं, सातवें दिन की पूजा में देवी को मनाने के लिए गंगा जल तथा समुद्र का जल लाना बड़ा पुन्यदायक माना जाता है, दुर्गा चालीसा का भी पाठ करना चाहिए, तामसिक आहार से बचाना चाहिए, दिन को शयन नहीं करना चाहिए, कम बोलना चाहिए, काम क्रोध जैसे विकारों से बचना चाहिए, यदि आप सकाम पूजा कर रहे हैं या आप चाहते हैं की देवी आपकी मनोकामना तुरंत पूर्ण करे तो स्तुति मंत्र जपें, स्तुति मंत्र से देवी आपको इच्छित वर देगी, चाहे शत्रुओं कि समस्या हो या बार बार धन हानि होने की समस्या हो या कोई गुप्त इच्छा, इस स्तुति मंत्र का आप जाप भी कर सकते हैं और यज्ञ द्वारा आहूत भी कर सकते हैं , देवी का सहज एवं तेजस्वी स्तुति मंत्र ॐ तृम तृषास्वरूपिन्ये चंडमुण्डबधकारिनयै नम:(न आधा लगेगा) नम: की जगह यज्ञ में स्वाहा: शब्द का उच्चारण करें व देवी की पूजा करते हुये ये श्लोक उचारित करें ॐ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोकस्याखिलेश्वरी एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरीविनाशनम यदि आप किसी शक्ति पीठ की यात्रा सातवें नवरात्र को करना चाहते हैं तो किसी कालिका शक्ति पीठ पर जाना चाहिए, देवी की पूजा में यदि आप प्रथम दिवस से ही कन्या पूजन कर रहे हैं तो आज सातवें नवरात्र को सात कन्याओं का पूजन करें, कन्या पूजन के लिए आई कन्या को दक्षिणा के साथ भोजन पात्र जैसे थाली गिलास आदि देने चाहिए जिससे अपार कृपा प्राप्त होगी, सभी मंत्र साधनाएँ पवित्रता से करनी चाहियें, सातवें नवरात्र को अपने गुरु से "सह्स्त्रहार भेदन दीक्षा" लेनी चाहिए, जिससे आप जीवन की पूरनता को अनुभव कर सकें व वैखरी वाणी की शक्ति प्राप्त कर देवी को प्रसन्न कर सकते हैं, सातवें नवरात्र पर होने वाले हवन में पंचमेवा व काली मिर्च की मात्रा अधिक रखनी चाहिए व घी मिलाना चाहिए, ब्रत रखने वाले फलाहार व दुग्धपान कर सकते हैं, एक समय ब्रत रखने वाले सातवें नवरात्र का ब्रत ठीक आठ बाबन पर खोलेंगे, ब्रत तोड़ने से पहले देवी की पूजा कर खीर व फलों का प्रसाद बांटना चाहिए, आज सुहागिन स्त्रियों को लाल पीले व चमकीले वस्त्र आदि पहन कर व श्रृंगार कर देवी का पूजन करना चाहिए, पुरुष साधक भी साधारण और लाल पीले व चमकीले वस्त्र धारण कर सकते हैं, भजन व संस्कृत के सरल स्त्रोत्र का पाठ और गायन करें या आरती का गायन करना चाहिए, प्रतिदिन देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करना चाहिए -कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ #Ishaputra #KaulantakPeeth #KaulantakVani #Navratri #Parv
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