• देवीधुरा वाराही धाम - उत्तराखंड


    “देवीधुरा“ हिमालयी राज्य उत्तराखंड के चम्पावत जिले में स्थित है। देवीधुरा को स्थानीय भाषा में “देधुर“ भी कहा जाता है। देवदार के विशाल वृक्षों से आच्छादित मनोहारी प्राकृतिक छटा बिखेरता देवीधुरा नामक यह तीर्थ स्थल समुद्र सतह से 6633 फीट ऊंची चोटी पर स्थित है।

    यहां की जलवायु ठण्डी है और दिसम्बर-जनवरी में बर्फ गिरती है। मां वाराही तीर्थ की चोटी पर भगवान शिव का भव्य मंदिर है। ‘मचवाल’ नाम से प्रसिद्व इस स्थल से हिमालय का जो विहरंग दृश्य दिखाई देता है वह देवीधुरा को और भी अलौकिक बना देता है।

    देवीधुरा में अनेक विशालकाय गोलाकार शिला खण्डों से बनी एक अद्भुत गुफा है। इस गुफा के भीतर अनेक मंदिर हैं जिनमें देवी देवताओं और उनके वाहनों के चित्र उकेरे गए हैं। इसी गुफा में मां वाराही देवी भी विराजमान हैं जिन्हें पिण्डिका या शिलारूप में पूजा जाता है।

    देवीधुरा स्थित श्री वाराही देवी का मंदिर आज विश्व प्रसिद्ध है। स्थानीयजन इसे ‘बाराही देवी’ कहकर पुकारते हैं। सप्तमात्रिकाओं में से एक स्वरूप मां वाराही का है। ग्रंथों में आया है कि समुद्र में डूबती पृथ्वी को उभारने हेतु भगवान विष्णु ने अवतार लिया था जिसे वराह अवतार कहा गया। वराह की जिस शक्ति ने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को बचाया वह वाराही है। वाराही सर्व शक्तिमान हैं। उनकी तीन आंखें हैं, जिसमें दाहिनी आंख समृद्धि प्रदान करती है और बांयी आंख विद्या तथा तीसरी आंख ज्ञान की प्रतीक है। प्रकृति के रूप में वाराही सृष्टि की रचना करती है, विष्णु माया रूप में वह इसे संरक्षित रखती है तथा मृत्यु देवी के रूप में वह सृष्टि का संहार करती है।

    देवीधुरा में अनेक मंदिर हैं, जो विभिन्न देवताओं को समर्पित हैं, किन्तु यहां की मुख्य आराध्य देवी मां वाराही ही है। वाराही को यहां दो पूजास्थल समर्पित है। अर्थात असीम श्रद्धा वाली प्राचीन गुफा मंदिर की मां गुह्येश्वरी तथा सिंहासन डोला के भीतर सदैव गुप्त रहने वाली मां गुप्तेश्वरी। देवी के मंदिर में नित्य पूजा का क्रम इस प्रकार है:- गणेश पूजा, गुह्येश्वरी, द्वारपाल, भैरवथान, कालिका, मचवाल शिव पूजा और अन्त में गुप्तेश्वरी को भोग लगता है।

    शैव संप्रदाय में वाराही मां को माता सती के रूप में पूजते हैं जिसका वर्णन शिव पुराण में हुआ है। शाक्त संप्रदाय में देवी महात्म्य तथा दुर्गा सप्तसती में वाराही का वर्णन हुआ है। वाराही देवी के अनेक स्वरूप हैं। मूर्तियों में उन्हें प्रायः चतुर्भुजी या अष्ठभुजी चित्रित किया गया है। उनके दो हाथ अभय मुद्रा (भय दूर करने वाली) और वरद (सुख-संपत्ति देने वाली) मुद्रा में हैं। अन्य हाथों में वे शंख, चक्र, गदा, कमल, फल, वज्र आदि धारण किये हुए हैं।

    रक्षाबंधन के दिन यहां बग्वाल खेलने की प्रथा है। यहां फलों और पत्थरों से एक दूसरे को मारा जाता है। लाखों लोगों की मौजूदगी में होने वाली बग्वाल में 4 खामों चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग के अलावा सात थोकों के योद्धा फरों के साथ हिस्सा लेते हैं। रक्षाबंधन पर्व पर यहां देश ही नहीं, विदेश से भी दर्शक इस बग्वाल को देखने के लिए आते हैं।

    बताया जाता है कि यहां पहले नरबलि दी जाती थी। जब गांव की एक बुजुर्ग महिला के बेटे की बारी आई, तो उस महिला ने देवी मां की तपस्या की। देवी ने महिला को बताया कि नर बलि न देकर एक व्यक्ति के बराबर रक्त होना चाहिए। तब से लेकर अभी तक इस बग्वाल में लोग फलों और पत्थरों से खेलते हैं। जब तक लोगों को चोट नहीं लग जाती और उनके खून नहीं निकल जाता, तब तक बग्वाल खेली जाती है।

    मां बाराही धाम देवीधुरा की भीम शिला का आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। भीम शिला एक विशालकाय शिला है जिसे लेकर मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पांडवों ने यहाँ वास किया और वे इस शिला के ऊपर चौसर खेलते थे।


    #varahi #devi #bhagwati #Guhyaeshwari #gupteshwari #himalayasculture #himalayas #uttarakhand
    देवीधुरा वाराही धाम - उत्तराखंड “देवीधुरा“ हिमालयी राज्य उत्तराखंड के चम्पावत जिले में स्थित है। देवीधुरा को स्थानीय भाषा में “देधुर“ भी कहा जाता है। देवदार के विशाल वृक्षों से आच्छादित मनोहारी प्राकृतिक छटा बिखेरता देवीधुरा नामक यह तीर्थ स्थल समुद्र सतह से 6633 फीट ऊंची चोटी पर स्थित है। यहां की जलवायु ठण्डी है और दिसम्बर-जनवरी में बर्फ गिरती है। मां वाराही तीर्थ की चोटी पर भगवान शिव का भव्य मंदिर है। ‘मचवाल’ नाम से प्रसिद्व इस स्थल से हिमालय का जो विहरंग दृश्य दिखाई देता है वह देवीधुरा को और भी अलौकिक बना देता है। देवीधुरा में अनेक विशालकाय गोलाकार शिला खण्डों से बनी एक अद्भुत गुफा है। इस गुफा के भीतर अनेक मंदिर हैं जिनमें देवी देवताओं और उनके वाहनों के चित्र उकेरे गए हैं। इसी गुफा में मां वाराही देवी भी विराजमान हैं जिन्हें पिण्डिका या शिलारूप में पूजा जाता है। देवीधुरा स्थित श्री वाराही देवी का मंदिर आज विश्व प्रसिद्ध है। स्थानीयजन इसे ‘बाराही देवी’ कहकर पुकारते हैं। सप्तमात्रिकाओं में से एक स्वरूप मां वाराही का है। ग्रंथों में आया है कि समुद्र में डूबती पृथ्वी को उभारने हेतु भगवान विष्णु ने अवतार लिया था जिसे वराह अवतार कहा गया। वराह की जिस शक्ति ने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को बचाया वह वाराही है। वाराही सर्व शक्तिमान हैं। उनकी तीन आंखें हैं, जिसमें दाहिनी आंख समृद्धि प्रदान करती है और बांयी आंख विद्या तथा तीसरी आंख ज्ञान की प्रतीक है। प्रकृति के रूप में वाराही सृष्टि की रचना करती है, विष्णु माया रूप में वह इसे संरक्षित रखती है तथा मृत्यु देवी के रूप में वह सृष्टि का संहार करती है। देवीधुरा में अनेक मंदिर हैं, जो विभिन्न देवताओं को समर्पित हैं, किन्तु यहां की मुख्य आराध्य देवी मां वाराही ही है। वाराही को यहां दो पूजास्थल समर्पित है। अर्थात असीम श्रद्धा वाली प्राचीन गुफा मंदिर की मां गुह्येश्वरी तथा सिंहासन डोला के भीतर सदैव गुप्त रहने वाली मां गुप्तेश्वरी। देवी के मंदिर में नित्य पूजा का क्रम इस प्रकार है:- गणेश पूजा, गुह्येश्वरी, द्वारपाल, भैरवथान, कालिका, मचवाल शिव पूजा और अन्त में गुप्तेश्वरी को भोग लगता है। शैव संप्रदाय में वाराही मां को माता सती के रूप में पूजते हैं जिसका वर्णन शिव पुराण में हुआ है। शाक्त संप्रदाय में देवी महात्म्य तथा दुर्गा सप्तसती में वाराही का वर्णन हुआ है। वाराही देवी के अनेक स्वरूप हैं। मूर्तियों में उन्हें प्रायः चतुर्भुजी या अष्ठभुजी चित्रित किया गया है। उनके दो हाथ अभय मुद्रा (भय दूर करने वाली) और वरद (सुख-संपत्ति देने वाली) मुद्रा में हैं। अन्य हाथों में वे शंख, चक्र, गदा, कमल, फल, वज्र आदि धारण किये हुए हैं। रक्षाबंधन के दिन यहां बग्वाल खेलने की प्रथा है। यहां फलों और पत्थरों से एक दूसरे को मारा जाता है। लाखों लोगों की मौजूदगी में होने वाली बग्वाल में 4 खामों चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग के अलावा सात थोकों के योद्धा फरों के साथ हिस्सा लेते हैं। रक्षाबंधन पर्व पर यहां देश ही नहीं, विदेश से भी दर्शक इस बग्वाल को देखने के लिए आते हैं। बताया जाता है कि यहां पहले नरबलि दी जाती थी। जब गांव की एक बुजुर्ग महिला के बेटे की बारी आई, तो उस महिला ने देवी मां की तपस्या की। देवी ने महिला को बताया कि नर बलि न देकर एक व्यक्ति के बराबर रक्त होना चाहिए। तब से लेकर अभी तक इस बग्वाल में लोग फलों और पत्थरों से खेलते हैं। जब तक लोगों को चोट नहीं लग जाती और उनके खून नहीं निकल जाता, तब तक बग्वाल खेली जाती है। मां बाराही धाम देवीधुरा की भीम शिला का आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। भीम शिला एक विशालकाय शिला है जिसे लेकर मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पांडवों ने यहाँ वास किया और वे इस शिला के ऊपर चौसर खेलते थे। #varahi #devi #bhagwati #Guhyaeshwari #gupteshwari #himalayasculture #himalayas #uttarakhand
    Love
    Like
    6
    0 Comentários 0 Compartilhamentos 570 Visualizações 0 Anterior
  • International Kaulantak Siddha Vidya Peeth has organised a seven day residential course on Vajra Yogini Kalpa from 17th march to 23rd march 2019.
    Once the most celebrated heroine and supreme goddess of Tantra, Vajra Yogini in the last seven hundred years has almost been forgotten. Only fragments of her practices remained in malformed traditions. Her practices reduced to misplaced Vajra Varahi practices.
    Under the guidance of HH Mahasiddha Ishaputra, Kaulantak Peeth sponsored the certification course on vajra yogini and her in-depth philosophy and practices.
    First day, students learnt the origin of Vajra Yogini and her traditions. Students also learnt Vajra Yoga, Dakini Kriya and mudras. They learnt about associated Yoginis in Vajra Loka of Devi and their yantra and mantra practices.
    It had been am exciting day full of spiritual energies. It was inspiring to see Vajra Yogini and practices revealed again in Siddha Dharma. The vast knowledge of MahaSiddha Ishaputra motivated all for authentic practices and refining their lives through several empowerments in Vajra Yogini Kalpa .

    #kaulantakpeeth #iksvp #course #tantra #vajra #yoga #dakini #yogini #ishaputra #siddhadharma #mahasiddhaishaputra #himalayansiddhas #kurukullatemple
    International Kaulantak Siddha Vidya Peeth has organised a seven day residential course on Vajra Yogini Kalpa from 17th march to 23rd march 2019. Once the most celebrated heroine and supreme goddess of Tantra, Vajra Yogini in the last seven hundred years has almost been forgotten. Only fragments of her practices remained in malformed traditions. Her practices reduced to misplaced Vajra Varahi practices. Under the guidance of HH Mahasiddha Ishaputra, Kaulantak Peeth sponsored the certification course on vajra yogini and her in-depth philosophy and practices. First day, students learnt the origin of Vajra Yogini and her traditions. Students also learnt Vajra Yoga, Dakini Kriya and mudras. They learnt about associated Yoginis in Vajra Loka of Devi and their yantra and mantra practices. It had been am exciting day full of spiritual energies. It was inspiring to see Vajra Yogini and practices revealed again in Siddha Dharma. The vast knowledge of MahaSiddha Ishaputra motivated all for authentic practices and refining their lives through several empowerments in Vajra Yogini Kalpa . #kaulantakpeeth #iksvp #course #tantra #vajra #yoga #dakini #yogini #ishaputra #siddhadharma #mahasiddhaishaputra #himalayansiddhas #kurukullatemple
    Love
    3
    0 Comentários 1 Compartilhamentos 2K Visualizações 0 Anterior
  • International Kaulantak Siddha Vidya Peeth has organised a seven day residential course on Vajra Yogini Kalpa from 17th march to 23rd march 2019.
    Once the most celebrated heroine and supreme goddess of Tantra, Vajra Yogini in the last seven hundred years has almost been forgotten. Only fragments of her practices remained in malformed traditions. Her practices reduced to misplaced Vajra Varahi practices.
    Under the guidance of HH Mahasiddha Ishaputra, Kaulantak Peeth sponsored the certification course on vajra yogini and her in-depth philosophy and practices.
    First day, students learnt the origin of Vajra Yogini and her traditions. Students also learnt Vajra Yoga, Dakini Kriya and mudras. They learnt about associated Yoginis in Vajra Loka of Devi and their yantra and mantra practices.
    It had been am exciting day full of spiritual energies. It was inspiring to see Vajra Yogini and practices revealed again in Siddha Dharma. The vast knowledge of MahaSiddha Ishaputra motivated all for authentic practices and refining their lives through several empowerments in Vajra Yogini Kalpa .

    #kaulantakpeeth #iksvp #course #tantra #vajra #yoga #dakini #yogini #ishaputra #kurukullatemple #siddhadharma #himalayansiddhas #mahasiddhaishaputra
    International Kaulantak Siddha Vidya Peeth has organised a seven day residential course on Vajra Yogini Kalpa from 17th march to 23rd march 2019. Once the most celebrated heroine and supreme goddess of Tantra, Vajra Yogini in the last seven hundred years has almost been forgotten. Only fragments of her practices remained in malformed traditions. Her practices reduced to misplaced Vajra Varahi practices. Under the guidance of HH Mahasiddha Ishaputra, Kaulantak Peeth sponsored the certification course on vajra yogini and her in-depth philosophy and practices. First day, students learnt the origin of Vajra Yogini and her traditions. Students also learnt Vajra Yoga, Dakini Kriya and mudras. They learnt about associated Yoginis in Vajra Loka of Devi and their yantra and mantra practices. It had been am exciting day full of spiritual energies. It was inspiring to see Vajra Yogini and practices revealed again in Siddha Dharma. The vast knowledge of MahaSiddha Ishaputra motivated all for authentic practices and refining their lives through several empowerments in Vajra Yogini Kalpa . #kaulantakpeeth #iksvp #course #tantra #vajra #yoga #dakini #yogini #ishaputra #kurukullatemple #siddhadharma #himalayansiddhas #mahasiddhaishaputra
    Love
    4
    1 Comentários 2 Compartilhamentos 2K Visualizações 0 Anterior